जीवन के रण का मार्मिक चित्रण - मैला आँचल

रेणु के मैला आँचल को पढ़ते हुए अतीत और वर्तमान की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। मेरीगंज में आज़ादी आती है, लेकिन जाति, गरीबी, पितृसत्ता और सत्ता की पुरानी परछाइयाँ बनी रहती हैं। और मेरीगंज, हमारे अपने समय का आईना बन जाता है।

REFLECTIONS

Pragati Prabha

10/2/2026

“सभी अपनी बात कहना चाह रहे हैं, एक साथ बोलना चाह रहे हैं। बातें बढ़ती जाती हैं, और असल सवाल बातों के बवंडर में दबा जा रहा है।”

दोपहर की चिलचिलाती धूप में बैठी एक पंचायत। एक समूह जो परंपरा की आड़ में शोषण करने के अपने अधिकार का बचाव कर रहा है। दूसरा समूह, जो सदियों से दमित है, पर आखिरकार अपनी गरिमा के संघर्ष के लिए उठ खड़ा हुआ है। उपरोक्त पंक्तियों में फनीशवरनाथ रेणु 'मैला आँचल'  के इस दृश्य में मौजूद तनाव का वर्णन करते हैं। इन वाक्यों को पढ़ते हुए, और कुल मिलाकर, इस उपन्यास को पढ़ते हुए, हम पाठक कभी ठीक-ठीक यह पता नहीं लगा पाते कि इसमें आज़ादी से पहले या 21वीं सदी बिहार के गाँव का वर्णन है? यही साहित्यिक महारत हमें बताती है कि यह उपन्यास क्यों उनकी सबसे बेहतरीन रचना है।

फणीश्वर नाथ रेणु की रचना ‘मैला आँचल’  की पृष्ठभूमि आज़ादी से कुछ साल पहले मेरीगंज नाम के एक गाँव की है। बिहार का यह गाँव समय में कैद वो चिड़िया है,‌ जो प्रगति की रोशनी से मुखबिर तो है, लेकिन गरीबी और रूढ़िवादिता की जंजीरें इसे आजीवन जकड़े रखती हैं। मैला आँचल का मेरीगंज बिहार की मिट्टी को प्रतिबिंबित करने में प्रेमचंद के गोदान और नागार्जुन की भोजपुर की सानी प्रतीत होता है।

इस जगह का नाम भारत और ब्रिटिश शासन के बीच आजादी के पहले के रिश्ते को दर्शाता है। इसकी शुरुआत इस बात की व्याख्या से होती है - गाँव का नाम 'मेरिगंज' इसलिए पड़ा क्योंकि सुविधाओं की कमी के कारण यहाँ एक अमीर अंग्रेज़ की पत्नी ‘मेरी’ की मौत हो गई थी| उस अमीर अंग्रेज़ की वह दुखद नियति हमें यह पूर्वाभास दिलाती है कि आने वाले किरदार भी उस अटल नियति से नहीं बच सकेंगे, जो एक पिछड़े गाँव में रहने से मिलती है।

मैला आँचल में कोई एक मुख्य पात्र नहीं है, बल्कि कई जटिल व्यक्तित्व हैं जो अपनी अनोखी आकांक्षाओं के साथ गाँव की ज़िंदगी में अपना रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ये कहानी कालजयी इसलिए है, क्योंकि इसके किरदारों को अपनी पहचान और सामाजिक उम्मीदों के बीच वैसी ही जद्दोजहद करते हुए दिखाया गया है, जैसी हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देखते हैं। चाहे वह बलदेव, कालीचरण या बावन हों, जो मेरीगंज में आज़ादी की लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए अपनी जातिगत पहचान को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, या फिर विश्वनाथ प्रसाद या राम कृपाल सिंह जैसे जमींदार, जो तेजी से बदलते परिवेश में अपनी सत्ता को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। क्या ये वही लोग हैं, जिनकी हम रोज़ तारीफ़ करते हैं, जिन्हें हम दोस्त मानते हैं, जिन्हें हम सुबह आईने में देखते हैं?

यह उपन्यास अपने लेखन में अद्वितीय है क्योंकि यह हमें एक ही बार में कई सामाजिक मुद्दों की बारीकियों के बारे में शिक्षित करता है। यह हमें ज़मीनी स्तर पर आजादी के आंदोलन की बारीकियों को दिखाता हैं – जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में ग्रामीण प्रतिनिधित्व, राष्ट्रवादी और वैचारिक आंदोलन बनाम धार्मिक कट्टरता, और सबसे बढ़कर – एक ग्रामीण समुदाय में जाति के नजरिए से इन नई पहचानों को कैसे समझा और अपनाया जाता है। चाहे वह कांग्रेस की सदस्यता के ज़रिए सामाजिक पदानुक्रम में बलदेव का अप्रत्याशित उत्थान हो, वैचारिक आंदोलनों में बौद्धिक श्रेष्ठता की रूढ़िवादी धारणा को तोड़ने वाला बाहुबली कालीचरण हो, या फिर बावनदास का उसी विचारधारा को सींचने के लिए अपना खून देना जिसने अंततः उनकी जान ले ली।

इन सब किरदारों के ज़रिए हम ग्रामीण भारत में सत्ता, प्रशासन और ज़मीन के मालिकाना हक के बदलते स्वरूप को देखते हैं, जहाँ वफादारी का बदलना ही एकमात्र स्थायी सच है। ये कहानियाँ वैसी ही हैं जैसी मेरे नानाजी अपनी जवानी की यादें ताज़ा करते हुए सुनाया करते थे, या वैसी ही जैसी मेरे गाँव की औरतें मेरी स्कूल की छुट्टियों के दौरान खुली आग पर लिट्टी सेंकते हुए अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बारे में बताती थीं।

यह उपन्यास इंसानी इच्छाओं और आपसी रिश्तों के प्रति भी अत्यंत सूक्ष्मदर्शी है। यह दिखाता है कि कैसे समाज की उम्मीदें इंसानी आकांक्षाओं के इज़हार का तरीका तय करती हैं। उदाहरण के तौर पर, उपन्यास में डॉ. प्रशांत की पृष्ठभूमि उसे मज़दूर वर्ग की भलाई के लिए कम्युनिस्ट मकसद के प्रति समर्पित बनाती है, जिसके चलते वे ग्रामीण पूर्णिया में मलेरिया पर रिसर्च और संथालों की कानूनी मदद करते हैं। परंतु यह समर्पण उनके जीवन के अन्य पहलुओं के बिल्कुल विपरीत है, जहाँ वह कमला जैसी एक अवयस्क बालिका के शरीर से सुख और रिसर्च की जानकारी हासिल करने में खुद भी एक शोषण प्रणाली का हिस्सा बन जाते हैं ।

फणीश्वर नाथ रेणु की ये रचना उनकी अद्भुत प्रतिभा का ‌उदाहरण तो है ही, साथ ही यह उनकी नारीवादी झुकाव का अनुस्मारक भी है। उनकी लेखनी पढ़ते वक्त मुझे ऐसा लगा कि वे काल्पनिक किरदारों के बारे में नहीं, बल्कि मेरी अपनी ज़िंदगी की असल महिलाओं के बारे में लिख रहे थे। मेरीगंज में महिलाओं को पितृसत्तात्मक समाज द्वारा गढ़ी तमाम बेड़ियों में जकड़ा हुआ दिखाया तो गया है; पर यही औरतों को हम उन्हीं बेड़ियों के अंदर अपने कर्मकत्व को इस्तेमाल कर अपनी आकांक्षाओं और लक्ष्य को प्राप्त करते हुए भी देखते हैं। चाहे वह फुलवा और लक्ष्मी हों, जो एक ऐसे शोषणकारी समाज द्वारा उन पर थोपी गई यौन इच्छाओं को अपनाकर उन्हें अपने ढंग से जीती हैं, या फिर ममता और कमला, जो अपनी मर्ज़ी और आज़ादी का इस्तेमाल करके मुश्किल हालात को अपने पक्ष में मोड़ लेती हैं जो उन्हें सामाजिक रूप से बर्बाद कर सकता था| यह उपन्यास मुझे बलात्कार की उस भयावह सामाजिक सच्चाई की याद दिलाता है, जहाँ स्त्री के शरीर को सज़ा और बदले के एक माध्यम की तरह इस्तेमाल किया जाता है—एक ऐसी सच्चाई, जो आज़ादी के अस्सी साल बाद भी बहुत नहीं बदली है।

मैला आँचल' रेणु की कालातीत मौलिक रचना है। इसमें उन महिलाओं का चित्रण नहीं है जो 'मैली' हैं, बल्कि भारत के उस ग्रामीण परिवेश का आईना, है जो रूढ़िवादी सामाजिक नियमों के उतार-चढ़ाव और मनमानी से ‘मैला’ हो गया है। यहाँ मैल कालिख नहीं, जीवन के संघर्ष का प्रमाण है।

लेखिका का परिचय

भागलपुर निवासरत प्रगति प्रभा इतिहास, राजनीति, नारीवाद और पहचान जैसे विषयों में रुचि रखती हैं। उन्हे इन विषयों पर संवाद, विवाद‌ और लिखने पर रुझान है। साथ ही वे 'ब्लड कनेक्ट' और' नयेपंख' जैसे देश के कई समूहों के साथ कार्यरत होकर सामाजिक ताने-बाने में बराबरी लाने के लिए प्रयासरत हैं।

साभार: पेंगुइन स्वदेश

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