माधोपुर का घर: सेपिया-रंग की एक तस्वीर

आधुनिकता और प्रगति की दौड़ में पीछे छूटे घरों की कल्पना ने हाल के वर्षों में साहित्य और सिनेमा में एक महत्वपूर्ण जगह बनाई है। माधोपुर का घर इसी बेचैनी और स्मृति के भूगोल को रचती है।

REFLECTIONS

Rashi Mohan

6/29/2026

दो मंज़िलों वाला एक घर। कई कमरे जो एक आँगन में खुलते हैं। आँगन में एक चूल्हा, जिससे हल्का-सा धुआँ उठता है। बीच में एक छोटी लकड़ी की मेज़ के इर्द-गिर्द चार कुर्सियाँ। एक तह किया अख़बार, चाय की रिंग लगे खाली कप। इधर-उधर बिखरी रबर की चप्पलें। कहीं पंखे की घरघराहट, और दूर से किसी सब्ज़ीवाले की अस्पष्ट, तीव्र आवाज़ें। यही है माधोपुर का नज़ारा। एक ऐसा घर जिसकी कल्पना हम कर सकते हैं, पर जहाँ अब बस बीते वक़्त की निशानियाँ बची हैं।

लोरा, एक पालतू मादा कुत्ता, इस उपन्यास की मुख्य कथावाचक है। लोरा उस बरसाती रात का ब्यौरा देते हुए कहानी शुरू करती है जब बाबा उसे घर लाए थे, और दादी इतनी नाराज़ हो गई थीं कि उन्होंने बाबा से बात करना बंद कर दिया। फिर धीरे-धीरे मुख्य किरदारों से परिचय होता है: दादी, बाबा, और उनके तीन बेटे उमंग, टीपू और हेमंग।

लोरा को घर तब लाया गया जब उमंग, टीपू और हेमंग का बचपन माधोपुर में कब का बीत चुका था। वे सब अपनी-अपनी ज़िंदगियों में आगे बढ़ चुके थे। और लोरा को बातचीत में सुने हुए टुकड़ों से उनके बीते हुए कल को समझना पड़ता है। कहानी चारों तरफ़ से धीरे-धीरे खुलती है: दादी का संस्मरण और लोरा का आख्यान बारी बारी से कहानी को आगे बढ़ाता है। जैसे-जैसे दादी अपनी परवरिश बयान करती हैं, लोरा उन हालातों को समझती है जिनकी वजह से दादी को उससे चिढ़ थी। लोरा के प्रति दादी की नाराज़गी केवल एक श्वान से चिढ़ नहीं रह जाती, बल्कि उसमें बाबा के प्रति उनकी पुरानी शिकायतें, अपने ही घर में अनसुने रह जाने का दुख, और स्त्री होने की गहरी असुरक्षा घुली हुई दिखती है।

लोरा भी दादी को निर्दयी नहीं समझती। धीरे-धीरे वह पहचानती है कि दादी का रूखापन उनके जीवन भर के अनुशासन, अपमान और आत्मरक्षा से बना है। दादी की स्मृतियों में उनका बचपन एक ऐसे ज़मींदार परिवेश में खुलता है जहाँ ज़मीन-जायदाद, जाति, और औरतों पर नियंत्रण जीवन को तय करते थे। बचपन से ही उन्हें यह सिखाया गया था कि स्त्री का संसार घर की चौहद्दी में है, और उनके अभिलाषाओं से अधिक महत्वपूर्ण परिवार की इज़्ज़त है। बिहार में होते राजनैतिक और सामाजिक बदलाव परिपेक्ष्य में दिखाई देते हैं, जैसे दादी के मायके का ब्रिटिश समाज से रिश्ता, स्वतंत्रता के बाद टूटती सामंती संरचनाएँ, और अगली पीढ़ी का पढ़-लिखकर गाँव से शहर की ओर निकल जाना।

इस उपन्यास के लेखक त्रिपुरारि शरण ने इस कहानी को अपनी रूह का एक हिस्सा बनाकर लिखा है। उनके छाप 'टीपू' में मिलते हैं, जो शरण की तरह एक आईएएस अफ़सर है। टीपू द्वारा कहने पर दादी का अपना जीवन कलमबंद करना और परिवार का श्वानप्रेम लेखक के अनुभवों से प्रभावित है। यहाँ तक कि जो घटनाएँ हम दादी की ज़ुबानी सुनते हैं, जैसे जॉर्ज पंचम का आना, वे सब वास्तविक हैं और निजी किस्सों से प्रमाणित हैं।

टीपू का चरित्र उपन्यास में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। लोरा जब माधोपुर के घर को समझने लगती है, तो वह यह देखती है कि दादी अपने बेटे टीपू से जिस स्नेह और सहजता से बात करती हैं, वैसी निकटता बाबा के साथ उनके संबंध में नहीं दिखाई देती। इस तरह टीपू दादी के भीतर बचे हुए ममत्व और असुरक्षा को समझने का रास्ता भी बनता है। दूसरी ओर, वह उन बच्चों की पीढ़ी से भी जुड़ा है जो बेहतर अवसरों की तलाश में गाँव से बाहर निकलते हैं। इसलिए माधोपुर का घर उसके लिए केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि वह मूल है जिससे दूर जाकर भी उसका रिश्ता नहीं टूटता। उपन्यास के अंतिम हिस्से में दादी का माधोपुर के घर से दूर, टीपू के साथ रहना इस बिछड़ाव को और मार्मिक बना देता है।

यह किताब न सिर्फ़ शरण के लिए आत्मकथात्मक है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए भी है जो बेहतर ज़िंदगी की तलाश में अपने गाँवों-क़स्बों को छोड़कर शहर आते हैं। शहरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों से बना है जो छोटे शहरों से प्रवास करके आए हैं। जिनके पास उन घरों की अनगिनत यादें हैं जहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वो ढलते-बनते रहे। ऐसे लोग, जब अपने पुराने गाँव-घरों में लौटते हैं, तो देखते हैं कि ज़ंग, धूल और काई अब उनके नए बाशिंदे बन गए हैं। धीरे-धीरे वे भी घर छोड़ देते हैं, और वह घर अकेले अपनी आख़िरी साँसें गिनता है।

माधोपुर पढ़ते हुए मुझे अचल मिश्रा की गामक घर और गीतांजलि श्री की माई याद आई - ऐसी कहानियाँ जो घर लौटने की तड़प को बयान करती हैं, और साथ ही यह भी जानती हैं कि वह घर अब वैसा नहीं रहा। तब यह तड़प अनाथ हो जाती है। घर छोड़कर जाने वाला घर की चाहत तो रखता है, पर यह नहीं जानता कि घर अब है कहाँ? यही सच्चाई है उन तमाम कई माधोपुर की जो अब खँडहर बन चुके हैं - उन जगहों की टूटी-फूटी याद, जहाँ कभी प्रेम था और अनबन थी, आम के पेड़ों से झूले लटकते थे, मूसलाधार बारिशें थी, बसंत के मेले और राम लीलाएं थी।

माधोपुर महज़ एक उपन्यास नहीं, बल्कि एक जीवंत दास्तान है, जो हमारी राहों में पीछे छूटी मंज़िलों के सुराग खोजती है। पूछती है कैसे वे घर, जहाँ कभी क़दमों की आहट कभी थमती नहीं थी, कैसे एक गुज़रे वक़्त की खामोश गूँज बनकर रह जाते हैं। लेकिन शायद यह घर लौटने की कहानी भी है। लेखक अपने बचपन के घर की उस पूरी यात्रा को, जिसे उन्होंने अपनी स्मृति में सँजोकर रखा है, बहुत बारीकी से फिर से गढ़ने की कोशिश करते हैं। याद करने की इस प्रक्रिया में हम उन घरों में दोबारा लौटने की कोशिश करते हैं जिन्हें कभी हम पीछे छोड़ आए थे। ऐसी कहानियाँ लिखने के लिए घर लौटने की कोशिश करनी पड़ती है, भले ही वह लौटना केवल स्मृतियों में ही क्यों न हो। जाने-अनजाने में हम शायद अपने जीवन और अपनी कला को अपने अतीत के इर्द-गिर्द ही आकार देने लगते हैं।

अंत में बचती है माधोपुर की एक धुँधली स्मृति। बाबा और लोरा दोनों चले जाते हैं। माधोपुर का घर एक ऐसा उपन्यास है जो एक रेखीय कहानी दर्शाने की कोशिश नहीं करता, पर एक चित्र बनाता है, जिससे एक पाठक पूरी तरह से उस गाँव, उस घर, और उसके सदस्यों को ऐसे समझ पाता है जैसे वो उसके अपने ही घर का वर्णन हो। शरण एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो अपनी ज़मीन में इस क़दर पैठी है कि वह हर किसी के माधोपुर का प्रतिबिम्ब है, और अपने साथ गुज़रे हुए कल को सेपिया-रंग की तस्वीरों के ज़रिए जीवंत करती है।

लेखिका का परिचय

राशि मोहन गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी से विधि की पढ़ाई कर रही हैं। उनकी रुचि लॉ और जेंडर के जटिल संबंधों को समझने में है, और वे भारत में हाशिए पर स्थित समुदायों के लिए न्याय को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में काम करना चाहती हैं। अपने खाली समय में उन्हें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सुनना, कविता पढ़ना और अपने दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद है।

आवरण: अजय कुमार पांडेय

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